मुखौटा

हंसी दिखावटी
ख़ुशी दिखावटी
परत दर परत खुलते जाते है |
अब तो झूठ भी ऐसी सादगी से बोले जाते है |
की सच से भी बढ़कर सच नज़र आते है |
नकलीपने का आलम तो कुछ ऐसा है |
वो जो परतो की गहराइयों में बसी एक आत्मा है |
आजकल तो उसकी ईमानदारी पर भी भरोसे कम ही किये जाते है |
©makkhan

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